'तोरबाज़' फिल्म समीक्षा || Torbaaz Film Review
गिरीश मलिक की तोरबाज़ कोशिश और जद्दोज़हद को दिखाती है, जिसमें
कुछ लोगों ने मासूम बचपन को उसका हक़ दिलाने के लिए ज़मीन-आसमान एक कर दिया। तोरबाज़ एक इमोशनल-थ्रिलर फ़िल्म है, जो
शुक्रवार को नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हो गयी।
कहानी
पूर्व आर्मी डॉक्टर
(नासीर
खान)
भारत
से
अफगानिस्तान
वापस
आता
है, जहां
आतंकवाद
का
साया
इस
कदर
गहराया
हुआ
है
कि
लोगों
के
जुबान
पर
हर
दिन
मरने
वालों
के
आंकड़े
भी
रटे
हुए
हैं।
इस
बार
आतंकवादियों
के
निशाने
पर
खासकर
छोटे
बच्चे
हैं, जिन्हें
सुसाइड
बम
बनाकर
बड़ी
साजिशों
को
अंजाम
दिया
जाता
है।
नासिर
ने
अफगानिस्तान
में
ही
एक
बम
ब्लास्ट
में
अपने
परिवार
को
खोया
था।
वह
यहां
एक
एनजीओ
से
जुड़ते
हैं, जो
उसकी
पत्नी
के
साथ
मिलकर
आएशा
(नरगिस
फ़ाखरी)
ने
शुरु
किया
था।
ये एनजीओ रिफ्यूजी
कैंप
के
लिए
काम
करता
है।
कैंप
में
रह
रहे
बच्चों
की
जिंदगी
उसे
बेचैन
करती
है।
वह
नहीं
चाहता
कि
किसी
बच्चे
को
बेबसी
में
सुसाइड
बम
बनना
पड़े
या
आतंकवाद
के
रास्ते
जाना
पड़े।
बच्चों
को
जिंदगी
में
एक
लक्ष्य
और
उम्मीद
देने
के
लिए
नासिर
क्रिकेट
का
सहारा
लेता
है।
वह
रिफ्यूजी
कैंप
के
बच्चों
को
लेकर
एक
टीम
बनाता
है
और
नाम
रखता
है-
‘तोरबाज़’। लेकिन
क्या
बच्चों
के
हाथों
से
बंदूकें
हटाकर
बल्ला
थमाना, उन्हें
एक
उम्मीद
देना
नासिर
के
लिए
एक
आसान
टास्क
होगा?
स्टार की परफॉरमेंस
अभिनय के लिहाज से ये फिल्म इसमें काम करने वाले बच्चों की फिल्म है। गिरीश मलिक ने इन बच्चों से जितना बेहतर काम लिया, उतना प्रभावशाली काम संजय दत्त और राहुल देव नहीं कर पाए हैं। संजय दत्त के चेहरे पर उम्र दिखने लगी हैं और वह लंबे सीन करने पर थके थके से भी दिखने लगते हैं। उनकी चिर परिचित ऊर्जा अब कैमरे के सामने नजर नहीं आती। राहुल देव को अब इस तरह के किरदारों से तौबा कर लेनी चाहिए। बार बार ऐसे किरदार करना उनकी आर्थिक मजबूरी हो सकती है लेकिन बतौर अभिनेता ऐसा करके वह अपने करियर पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। नरगिस फखरी को फिल्म में जिस काम के लिए रखा गया, वह उन्होंने बखूबी कर दिया, उससे ज्यादा की उनसे उम्मीद भी नहीं रही होगी।
संजय दत्त अपने रोल में ठीक लगे हैं। वहीं, नरगिस फाखरी का रोल बहुत लम्बा नहीं है, मगर जितना है, उसे उन्होंने ठीक से निभाया है। फ़िल्म के प्रोड्यूसर राहुल मित्रा ख़ुद भी अफ़गानिस्तानी सैन्य अफ़सर के रोल में दिखे हैं। राहुल देव ने तालिबानी लीडर क़ज़ार के किरदार को बेहतरीन ढंग से निभाया है। राहुल ने इस किरदार के लिए ज़रूरी भाषा और भावों को लेकर जो संयम बरता है, उससे यह प्रभावशाली हो गया।
हीरू केसवानी की सिनेमैटोग्राफी ने अफ़गानिस्तान की ख़ूबसूरती के साथ बर्बादी को कामयाबी के साथ क़ैद किया है। बिक्रम घोष और विक्रम मोंटरोस का संगीत दृश्यों को सपोर्ट करता है। प्रोडक्शन के स्तर पर तोरबाज़ विजुअली रिच फ़िल्म है। फ़िल्म के क्रेडिट रोल में ऐसे सभी रियल लाइफ़ हीरोज़, संगठनों और क्रिकेटर्स का शुक्रिया अदा किया जाता है, जो इन चिल्ड्रेन ऑफ़ वॉर को सपोर्ट कर रहे हैं।
डायरेक्शन
फिल्म ‘तोरबाज’ में गिरीश मलिक ने बतौर लेखक एक बहुत ही संवेदनशील विषय को छुआ और इस पर काफी मेहनत से एक अच्छी कहानी भी लिखी। लेकिन, पटकथा लेखन और निर्देशन में वह मात खा गए। निर्देशक जब अपने निर्माता को सिर्फ इसलिए एक्टर बनाने को राजी हो जाए कि वह फिल्म में पैसा लगा रहा है तो उसकी मजबूरी समझी जा सकती है। निर्देशन विषय के प्रति समर्पण की कला है। यह समझौतों के बीच निखर नहीं सकती। गिरीश मलिक का दृष्टिकोण विशाल है, उतने विशाल निर्माता भी आगे चलकर उन्हें मिले तो वह विश्वसिनेमा में अपनी धमक छोड़ सकते हैं। लेकिन, यहां उनकी सोच पचास फीसदी भी पर्दे पर नहीं उतर पाई।
कहाँ रह गयी कमी
फिल्म का विषय और उसके पीछे की सोच अच्छी है.. पॉजिटिव है। आकंतवाद और क्रिकेट का साथ लाना भी दिलचस्प है। लेकिन स्क्रीन तक आते आते फिल्म की आत्मा नहीं रह जाती है। ‘तोरबाज’ को दो घंटों तक जो देखने लायक बनाता है, वह हैं इसके बच्चे।रफ़्तार के मामले में फ़िल्म थोड़ा मात खा जाती है। फ़िल्म को पेस पकड़ने में टाइम लगता है।
देखे या नहीं
अच्छे विषय पर बनी बोझिल फिल्म है तोरबाज़.. लिहाजा, इसमें दो घंटें देना समय की बर्बादी होगी। संजय दत्त के फैन हैं तो एक दफा देख डालिये।
और अंत में रेटिंग
कलाकार- संजय दत्त, नर्गिस फाखरी, राहुल देव आदि।
निर्देशक- गिरीश मलिक
निर्माता- राहुल मित्रा, गिरीश मलिक आदि।
रेटिंग- 2/5
अवधि- 2 घंटा 15 मिनट










1 टिप्पणियाँ
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