दुर्गामती फिल्म समीक्षा || Durgamati Film Review
नेता
अपनी सत्ता और सियासत को बचाने के लिए किस तरह सरकारी तंत्र का ग़लत इस्तेमाल करते हैं, यह भी हिंदी सिनेमा के दर्शक सैकड़ों दफ़ा पर्दे पर देख चुके हैं। राजनीतिक भ्रष्टाचार और
पद के दुरुपयोग पर हिंदी सिनेमा में अनगिनत फ़िल्में आयी हैं।शुक्रवार को अमेज़न प्राइम पर रिलीज़ हुई भूमि पेडनेकर की दुर्गामती इसी परम्परा की एक बेहद कमज़ोर फिल्म है, जिसका ट्रीटमेंट हॉरर-थ्रिलर की तरह रखा गया हालांकि, दुर्गामती हर मोर्चों पर विफल साबित होती है।
कहानी
फिल्म
दुर्गामती
की कहानी ईश्वर प्रसाद (अरशद वारसी) से शुरू होती है। ईश्वर प्रसाद ईमानदार नेता और जल संसाधन मंत्री है। उसके इलाके में मंदिरों से पुरानी मूर्तियां चोरी हो रही हैं, जिससे लोगों में बहुत नाराजगी है। ऐसे में ईश्वर प्रसाद लोगों से वादा करता है कि वह 15 दिनों अंदर मूर्तियां वापस लाएगा और अगर ऐसा नहीं होता है तो वह राजनीति से संन्यास ले लेगा।
अब मूर्तियां वापस लाकर ईश्वर प्रसाद जनता के बीच हीरो ना जाए इसके लिए दूसरी पार्टी के नेता उसके खिलाफ एक साजिश रचते हैं। इसके लिए सीबीआई अधिकारी शताक्षी गांगुली (माही गिल) को काम पर लगाया जाता है। ईश्वर प्रसाद के बारे में पता करने के लिए आईएएस ऑफिसर चंचल चौहान (भूमि पेडनेकर) से पूछताछ की जाती है जो ईश्वर प्रसाद की सेक्रेटरी रह चुकी हैं और खून के इल्जाम में जेल में सजा काट कर रही है। अब इस कैदी को एक पुरानी और सुनसान हवेली में रहने के लिए छोड़ दिया जाता है। यही से फिल्म दुर्गामती की असली कहानी से शुरू होती है।
फिल्म में ऐसे कई हॉरर सीन हैं जो बेवजह क्रिएट किए गए हैं। हालांकि, फिल्म में ऐसे कई ट्विस्ट हैं, जो काफी मजेदार हैं। इसके क्लाइमैक्स में क्या होता है यह जानने के लिए आपको पूरी फिल्म देखनी पड़ेगी।
स्टार की परफॉरमेंस
भूमि
पेडनेकर बेहद अच्छी और टैलेंटेड ऐक्टर हैं और यह बात साबित भी कर चुकी हैं लेकिन इस फिल्म में वह जरूरत से ज्यादा लाउड हैं जो आपको अजीब ही लगेगा। भूमि पेडनेकर को एक्सपेरिंटल रोल्स के लिए जाना जाता है, लेकिन इस फिल्म उनकी एक्टिंग का जादू नहीं चला। भूमि के चेहरे के हाव-भाव और डायलॉग्स आपस में मेल नहीं खाते हैं।
सीबीआई अफ़सर के रोल में माही गिल बिल्कुल प्रभावित नहीं करतीं। उनका किरदार बंगाली दिखाया गया है, जिसे जस्टिफाई करने के लिए वो उच्चारण से जूझती रहती हैं।
जीशु
सेनगुप्ता
की ओवरएक्टिंग बर्दाश्त से बाहर है। जिशु सेनगुप्ता बंगाली सिनेमा के बेहतरीन कलाकार माने जाते हैं, मगर हिंदी सिनेमा में ऐसे किरदार करने की उनकी मजबूरी समझ नहीं आती।
अरशद
वारसी ने भी ठीक काम किया है।
करण
कपाड़िया
की बात करें तो अगर वह फिल्म में नहीं भी होते तो कोई फर्क नहीं पड़ता। करण की संवाद अदायगी सुनकर सुनील शेट्टी की याद आ जाती
है।
फ़िल्म
की सहायक स्टार कास्ट भी प्रभावित नहीं कर पाती।
डायरेक्शन
फिल्म
दुर्गामती
का निर्देशन जी अशोक ने किया है। इसकी स्क्रिप्ट काफी कमजोर हैं ऐसे में इसके डायरेक्शन में कुछ कमाल करना संभव ही नहीं है। एक बेहतर स्क्रिप्ट ही फिल्म को उम्दा बनाने का काम करती है। फिल्म में कई खामियां हैं और सितारों की परफॉर्मेंस भी निराश करती है। फिल्म का राजनीतिक एंगल काफी बोर करने वाला है। इसके अलावा फिल्म के कई हॉरर सीन भी बेतुके लगते हैं।
कहा रह गयी कमी
दुर्गामती देखने के बाद एक सवाल ज़हन में कौंधता है, दक्षिण भारत में हिट फ़िल्म बनाने के बाद उन्हीं निर्दशकों को हिंदी में फ़िल्म बनाते वक़्त आख़िर क्या हो जाता है कि वो करिश्मा ग़ायब रहता है? जिन लोगों ने भागमती देखी है, वो इस सवाल को अधिक समझ पाएंगे। कुछ दृश्यों को छोड़ दें तो फ़िल्म डराना तो छोड़िए चौंकाती भी नहीं। फ़िल्म का क्लाईमैक्स खींचा हुआ और अति-नाटकीयता से भरपूर है। फ़िल्म की अवधि भी इसकी एक कमज़ोरी है। ढाई घंटे की फ़िल्म की अवधि कम करके इसे कसा जा सकता था।
देखे या नहीं
वीकेंड
पर खाली हों तो देख सकते हैं। न भी
देखें तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
और अंत में रेटिंग
कलाकार- भूमि पेडनेकर, अरशद वारसी, करण कपाड़िया, माही गिल, जिशु सेनगुप्ता आदि।
निर्देशक- जी अशोक
निर्माता- भूषण कुमार, अक्षय कुमार आदि।
रेटिंग – 2/5
अवधि-
2 घंटा 35
मिनट










2 टिप्पणियाँ
good
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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