Khaali
Peeli Film Review || 'खाली-पीली' फिल्म समीक्षा
कोरोना
वायरस लॉकडाउन की वजह से सिनेमाघर बंद होने के कारण कई ऐसी फ़िल्मों को ओटीटी का
रुख़ करना पड़ा,
जो सिनेमाघरों में रिलीज़ करने के
लिए बनायी गयी थीं। इन्हीं में से एक ईशान खट्टर और अनन्या पांडेय की फ़िल्म 'खाली-पीली'
है, 'खाली-पीली' बॉलीवुड स्टाइल की टिपिकल मसाला
एंटरटेनर है,
जिसमें एक हीरो है, हीरोइन है, विलेन है, थोड़ा नाच-गाना और एक्शन है।
फ़िल्म
का ट्रीटमेंट आपको अस्सी के दौर के उस सिनेमा के सफ़र पर ले जाता है, जब इन सब तत्वों को बोलबाला हुआ
करता था। इसका एहसास क्रेडिट रोल्स के दृश्यों से हो जाता है, जब एक चेज़ सीक्वेंस में ट्रेन के
डब्बों के बीच से भागते-भागते फ़िल्म का हीरो अचानक बड़ा हो जाता है। सत्तर और
अस्सी के एक्शन ड्रामा में ऐसे सीन ख़ूब देखने को मिलते थे।
कहानी-
'खाली पीली' की कहानी शुरू होती है मुंबई में
टैक्सीऔ स्ट्रा इक की रात को टैक्सीा निकालने वाले एक ड्राइवर यानी ईशान खट्टर से, जो इस टैक्सी्-हड़ताल का फायदा
उठाकर पैसेंजरों से एक्ट्रा पैसे ले
रहा है. इसी लालच में वो पूजा यानी अनन्याउ पांडे को अपनी गाड़ी में बैठा लेता है
और यहीं से शुरू होती है भागम-भाग की कहानी.
पूजा के
पीछे यूसुफ़ (जयदीप अहलावत) के गुंडे लग जाते हैं। यूसुफ एक पिंप है, जो जिस्मफरोशी के धंधे में है। एक
और घटनाक्रम होता है,
जिसके बाद मुंबई क्राइम ब्रांच का
अफ़सर तावड़े (ज़ाकिर हुसैन) उनके पछे पड़ जाता है।
कहानी
बहुत साधारण है और देखी-देखी लग सकती है,
मगर यश केसरवानी और सीमा अग्रवाल
के स्क्रीनप्ले ने सपाट कहानी को रोमांचक बना दिया। पटकथा में फ्लैशबैक का बेहतरीन
इस्तेमाल किया गया है,
जिसके चलते एंटरटेनमेंट डोज़ कम
नहीं हुई। विजय और पूजा के बचपन वाली मासूम लव स्टोरी बीच-बीच में आये फ्लैशबैक के
ज़रिए सामने आती है।
पटकथा के
ये हिस्से दर्शक का इंटरेस्ट बनाए रखते हैं। बैकस्टोरी के ज़रिए ही पता चलता है कि
यूसुफ़ से विजय का पुराना रिश्ता है और उसकी मौजूदा ज़िंदगी में उथल-पुथल के लिए
वो ही ज़िम्मेदार है। यूसुफ़,
बचपन से ही विजय और पूजा की लव
स्टोरी का असली खलनायक भी है। किसी दृश्य के बाद उसे समझाने के लिए बैकस्टोरी दिखाने
का प्रयोग सफल रहा है,
जो 'खाली-पीली'
की एकरूपता को तोड़कर रोमांच
बनाये रखता है।
स्टार कास्ट की परफोर्मेंस -
ईशान
ख़ट्टर की यह तीसरी फ़िल्म है। एंथनी वाली बोली में थोड़ा सा ‘तेजाब’
का और थोड़ा सा ‘रंगीला’
का मुन्ना भी मिलाकर ईशान खट्टर
ने जो किया है,
वह वही कर सकते हैं। इस लड़के में
जान है। मेहनत से अभिनय करता है। और,
किरदार को जीने में जान लगा देता
है। फिल्म में अगर किसी को फुल मार्क्स मिलते हैं तो वह ईशान खट्टर ही हैं। ईशान
ने विजय के किरदार को कामयाबी के साथ निभाया है। स्ट्रीट स्मार्ट लड़कों के
मुंबइया एक्सेंट को उन्होंने काफ़ी क़रीब से पकड़ा है। 'रागरतन'
जैसे शब्द गुदगुदाते हैं। दरअसल, फ़िल्म का शीर्षक 'खाली-पीली'
भी उसी मुंबइया स्लैंग से ही आया
है।
अनन्या
पांडेय की भी यह तीसरी रिलीज़ है। इस फ़िल्म में पूजा के किरदार में अनन्या अच्छी
लगी हैं और ईशान के साथ मिलकर 'खाली-पीली' को मनोरंजन के हाइवे पर भटकने
नहीं दिया।
स्वानंद
किरकिरे फ़िल्म का सरप्राइज़ हैं। स्वानंद ने अधेड़ उम्र के अमीर आदमी का किरदार
निभाया है,
जो बिज़नेस की आड़ में जिस्मफरोशी
का धंधा चलाता है। वो अपने से कई साल छोटी पूजा से शादी करना चाहता है। बेहतरीन
गीतकार स्वानंद को इस किरदार में अभिनय करते देखना चौंकाता भी है और इंटरेस्ट भी
जगाता है।
जयदीप अहलावत बेहतरीन एक्टर हैं और इस किरदार को निभाना उनके लिए बिल्कुल भी चुनौतीपूर्ण नहीं था।
अनूप
सोनी को ज़्यादा स्क्रीन टाइम नहीं मिला है,
मगर जितनी देर के लिए आते हैं, ठीक लगते हैं।
सतीश
कौशिक अपने स्पेशल एपीयरेंस कॉमेडी से पूरी फिल्म में कॉमेडी का तड़का लगाते नज़र आते है।
'खाली-पीली' के दोनों बाल कलाकारों वेदांत देसाई और देशना दुगड़ ने विजय यानि ब्लैकी और पूजा के किरदारों को स्थापित करने में अहम योगदान दिया है।
फिल्म का म्यूजिक
'खाली-पीली' में संगीत की सबसे अच्छी बात यह
है कि यह कहीं भी स्क्रीनप्ले को बाधा नहीं पहुंचाता। सिर्फ़ तीन गाने हैं, जो सिचुएशनल हैं। बैकग्राउंड में
बजने वाला 'तहस-नहस' प्रभावित करता है, जिसे शेखर रवजियानी (विशाल-शेखर)
और प्रकृति कक्कड़ ने आवाज़ दी है। विवाद के बाद 'दुनिया
शरमा जाएगी'
गीत से बियॉन्से शब्द को हटा दिया
गया है। संचित बलहारा और अंकित बलहारा का बैकग्राउंड स्कोर 'खाली-पीली'
के रोमांचक सफ़र को गति देता है।
एडिटिंग
रामेश्वर
भगत की एडिटिंग स्टाइलिश है। ख़ासकर,
वो दृश्य, जिसमें विजय, यूसुफ के आदमी से पूजा को सौंपने
के बदले में मोल-भाव कर रहा होता है,
प्रभावित करता है। इस दृश्य में
एक चलती हुई और एक रुकी हुई टैक्सी के दृश्यों को जोड़कर बनाये गये मोंटाज ध्यान
आकर्षित करते हैं।
डायरेक्शन-
निर्देशक
मक़बूल ख़ान ने फ़िल्म के सभी विभागों का सही इस्तेमाल किया है। कहानी में नयापन
ना होने के बावजूद इसे प्रस्तुत करने का अंदाज़ लुभाता है। 'खाली-पीली'
अस्सी के दौर की मसाला फ़िल्मों
का एहसास देती है ।
मुंबई को
नज़दीक़ से देखने वाले जानते होंगे कि आम बोलचाल की भाषा में खाली-पीली का अर्थ
होता है बेवजह या बिना बात के। निर्देशक मकबूल ख़ान ने मुंबइया भाषा के इसी
सिग्नेचर स्टाइल को अपनी फ़िल्म का शीर्षक बनाया। 'खाली-पीली' शीर्षक रखने की एक वजह यह भी है
कि यह सुनने में काली-पीली जैसा लगता है,
जो समंदर और सितारों की तरह मुंबई
की एक पहचान रही है। निजी कम्पनियों की ऐप आधारित टैक्सी सर्विसेज शुरू होने से
पहले मुंबई के रास्तों पर इन्हीं काली-पीली टैक्सी का सिक्का चलता था। 'खाली-पीली'
में यही काली-पीली रोमांच के रंग
भरती है।
कहाँ रह
गयी कमी -
खाली
पीली तेलगु मूवी टैक्सीवाला (Taxiwala)
की रीमेक है. टैक्सी वाला अच्छी
फिल्म है. खाली पीली ने ओरिजिनल फिल्म का सत्यानाश कर दिया है.फिल्म की खामियों की बात करें तो स्टोरी में कुछ भी
ऐसा नया या अनोखा नहीं है जो आपने इससे पहले किसी फिल्म में न देखा हो. साथ ही
सेकंड हाफ में चीजें पर्दे पर होने से पहले आपके दिमाग में होने लगती हैं. जैसे
ट्रैफिक जाम में फंसे ब्लैकी और पूजा मेला देखने उतर जाता हैं और पुलिस से बचने की
कोशिश करते हैं,
पर अगले ही पल स्टेज पर नाचने
लगता हैं. ‘अमर अकबर एंथनी’ के एंथनी का फैन लगता है और वैसे
ही बोलने की कोशिश करता है क्योंकि टपोरी वह लगता नहीं है। घर से भागी पूजा उससे
टकराती है। स्टाइल उसका भी भंकस करने वाला ही है। यहां से शुरू होती है कहानी
जिनके बारे में कह सकते हैं,
राम मिलाई जोड़ी…! ‘खाली पीली’ देखने के लिए आपके पास बहुत सारा
फालतू टाइम (कम से कम दो घंटे) और बड़ा वाला जिगर चाहिए। फिल्म का नाम अगर आप अपने
पड़ोसी से भी पूछेंगे तो उसे शायद पता न हो कि ऐसी कोई फिल्म साल भर से बन भी रही
है।, इसकी जानकारी तो आपके घर में भी
शायद ही किसी को हो.
देखे या नही -
'खाली पीली' एक फुल-ऑन मसाला फिल्मा है जो
धांसू एक्शन से लेकर लटके-झटके वाले गाने तक, बॉलीवुड
मसाला फिल्मा का हर फ्लेवर लिए हुए है. फिल्म के कई सीन आपके चेहरे पर स्माइल बिखेर
देंगे. कहानी एक रात की है और क्लाइमैक्स में रात से दिन भी होता है, तो ज्यादा खिंचने जैसा कुछ है
नहीं. फिल्म का सबसे प्लस पॉइंट है,
ईशान और अनन्या की फ्रेश
केमिस्ट्री. ये जोड़ी पर्दे पर नई है और काफी अच्छी भी लग रही है. डायलॉग में
पूरा मुंबईया पुट है और अगर आपको मुंबई की ये टपोरी भाषा पसंद है तो आपको इस
फिल्म को देखने में काफी मजा आएगा. हालांकि बहुत ज्यादा लॉजिक लगाने बैठेंगे तो
मसाला फिल्मे का लुत्फए नहीं उठा पाएंगे. अगर आप बॉलीवुड मसाला फिल्मों के फैन हैं, 'ढिशुम-ढिशुम' देखने में मजा आता है तो ये
फिल्म आपके लिए ही बनी है.
हिंदी सिनेमा बड़ी स्क्री न के लिए बना है और निर्देशक मकबूल खान की भी ये फिल्म बड़े पर्दे पर देखने के लिए बनी है. हालांकि कोरोना के इस दौर में इस फिल्म को ओटीटी पर रिलीज किया गया है, लेकिन ऐसी मसाला फिल्में अपने गानों, डायलॉग्स और एक्शन सीन पर सिंगल स्क्रीन्स में दर्शकों को उछलने पर मजबूर करने के लिए बनाई जाती हैं. ईशान ने अपने अंदाज में कोशिश तो वहीं की थी और अनन्या भी अपनी कुछ फिल्मों के बाद इस फिल्म में काफी कॉफिडेंट नजर आ रही हैं.
और अंत में रेंटिंग
निर्देशक-
मक़बूल ख़ान
कलाकार-
ईशान खट्टर,
अनन्या पांडेय, जयदीप अहलावत, ज़ाकिर हुसैन, अनूप सोनी, सतीश कौशिक आदि।
संगीत-
विशाल शेखर
प्लेटफॉर्म-
ज़ीप्लेक्स
शैली- एक्शन-ड्रामा
रेटिंग- 3/5




















3 टिप्पणियाँ
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