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'Serious Men' Film Review || 'सीरियस मेन' फिल्म समीक्षा

'सीरियस मेन' फिल्म समीक्षा ||  'Serious Men' Film Review 




बॉस की झिड़कियों के साथ तंगहाली में जीवन बिताने वाला अय्यन अपने बेटे को एक सुरक्षित और कामयाब भविष्य देना चाहता है। वो उसे सीरियस मैन बनाना चाहता है। यहां सीरियस का सांकेतिक मतलब अभिजात समझा जाए।

सीरियस मेन मुख्य रूप से दो 'घाटालों' यानि स्कैम्स की कहानी है। एक स्कैम अंतरिक्ष में एलियन माइक्रोब्स की खोज के नाम पर हो होता है, जिसे एक बेहद मशूहर स्पेस साइंटिस्ट अंजाम देता है, जो जाति से ब्राह्मण है। दूसरा घोटाला धरती पर अपने वजूद को साबित करने के लिए एक पिता करता है, जो दलित समुदाय से है। इन दोनों घोटालों के बीच सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव से निकलने की छटपटाहट और गगनचुम्बी इमारतों में रहने वाले अभिजात क्लास के स्टेटस का पीछा करने की व्याकुलता 'सीरियस मेन' के ड्रामे का सार है।






सीरियस मेन ऐसे अनगिनत बच्चों की कहानी भी है, जिनका बचपन अपने माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ जाता है। यह अलग बात है कि इसके संवादों और कुछ दृश्यों की वजह से बच्चे ही इस फ़िल्म को नहीं देख पाएंगे। संवादों को वास्तविकता के नज़दीक रखने के चक्कर में गालियों का धारा-प्रवाह इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, वो किरदार और वक़्त की ज़रूरत के हिसाब से ही है।




फिल्म में दिखाया गया है कि कुछ बच्चे कैसे अपने मां-बाप की इच्छाओं के तले अपने हुनर को खत्म करते शानदार करियर बनाने की होड़ में चल देते हैं। ये कहानी अधिकतर बच्चों की है जहां बच्चों का भविष्य पैदा होते ही सोच लिया जाता है।


फ़िल्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हो गयी और इसके साथ नवाज़ ने नेटफ्लिक्स के साथ अपनी हेट्रिक पूरी कर ली, जिसकी शुरुआत चर्चित और विवादित वेब सीरीज़ 'सेक्रेड गेम्स' से हुई थी।




कहानी




तमिलनाडु के एक छोटे से गांव के दलित परिवार से ताल्लुक रखने वाला अय्यन मणि (नवाज़उद्दीन सिद्दीक़ी) मुंबई की एक चॉल में एक छोटे से कमरे में पत्नी (इंदिरा तिवारी) के साथ रहता है। अय्यन साइंटिस्ट डॉ. आचार्य (नासर) का पीए है। बॉस की आदतन झिड़कियों के साथ तंगहाली में जीवन बिताने वाला अय्यन अपने बेटे को एक सुरक्षित और कामयाब भविष्य देना चाहता है। वो उसे 'सीरियस मैन' बनाना चाहता है। यहां सीरियस का सांकेतिक मतलब अभिजात समझा जाए।

बेटे के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की उत्कट चाहत के लिए वो एक ऐसा खेल रचता है, जिसका ग़लत अंजाम उसे बर्बादी की ओर ले जाता है। अय्यन अपने सामान्य बुद्धि वाले बेटे को दुनिया के सामने एक जीनियस के तौर पर प्रोजेक्ट करता है। इसके लिए वो उसे बड़ी-बड़ी बातें और वैज्ञानिक शब्दावली सिखाता है। किसी पब्लिक स्पीकिंग के दौरान ज़रूरत पड़ती है तो ब्लू टूथ और हियरिंग एड के ज़रिए उसे आगे की पंक्तियां बताता है।




इससे उसे समाज में रुतबा, शोहरत, पैसा सब कुछ मिलता है। मगर, एक वक़्त बाद बच्चा झूठ के इस बोझ को उठा नहीं पाता और उसका राज़फ़ाश होने लगता है। उधर, डॉ. आचार्य की अंतरिक्ष में एलियन माइक्रोब्स की तलाश बोगस साबित होती है और उनकी नौकरी चली जाती है, जिसके लिए काफ़ी हद तक अय्यन ज़िम्मेदार होता है। अब कहानी ऐसे मोड़ पर आ जाती है, जब अलग-अलग आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के दोनों 'घोटालेबाज़' एक-दूसरे की मदद करके अंतत: इसे एक निर्णायक क्लाइमैक्स की ओर ले जाते हैं।




स्टार की परफॉरमेंस






नवाज़उद्दीन की क्षमताओं को देखते हुए, ऐसे चरित्र निभाना उनके लिए कोई चुनौती नहीं रही। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के लिए इस तरह के किरदार अब बाएं हाथ का खेल हो चुके हैं। घटिया सेक्स सीन उनकी पहचान बनते जा रहे हैं। नवाज़ ने अय्यन के किरदार के विभिन्न पहलुओं का कामयाबी के साथ पर्दे पर पेश किया है। मुंबई में रहने वाले दक्षिण भारतीय किरदार के लहज़े को नवाज़ ने पकड़कर रखा है। अभिनय उनका बढ़िया है, पर ये सब वह क्यों करते हैं, वह ही जानें। कोई रिकॉर्ड वगैरह बनाना चाह रहें तो अलग बात है, नहीं तो नवाज की फिल्मों में नवाज की अदाकारी देखने का लोग अब भी इंतजार करते हैं।

 मगर, सबसे अधिक प्रभावित किया बेटे का किरदार निभाने वाले बाल कलाकार अक्षत दास और पत्नी बनीं इंदिरा तिवारी ने।



अक्षत दास का कमाल यहां देखने लायक है अक्षत ने पिता की आकांक्षाओं के बोझ तले दबे मासूम बेटे की जीत और हार को बेहद सधे हुए तरीक़े से जिया है। ख़ासकर वो दृश्य, जब जीनियस होने का किरदार ना निभा पाने की चोट उसके नन्हे मन और दिमाग पर असर करती है।

वहीं, इंदिरा ने चॉल में रहने वाली निम्न आय वर्ग की महिला के हाव-भाव को पूरी शिद्दत से पर्दे पर उतारा है। इस किरदार के लिए उनका होमवर्क कमाल का हैं। लगता नहीं कि इंदिरा एक्टिंग कर रही हैं।

नेता और बिल्डर के रोल में संजय नर्वेकर और उनकी भावी पॉलिटिशियन बेटी के रोल में श्वेता बसु प्रसाद ने ठीक-ठाक काम किया है।




डायरेक्शन




सुधीर मिश्रा की फ़िल्म सीरियस मेन मनु जोसेफ के इसी नाम से आये नॉवल पर आधारित है। आपको कहीं ऐसा नहीं लगेगा कि ये काल्पनिक है। फिल्म एक तरफ़ जातिगत कुंठा और ग़रीबी से त्रस्त एक इंसान की आकांक्षाओं पर टिकी है, फिल्म आज के एजुकेशन सिस्टम पर चोट करती है। वहीं एजुकेशन सिस्टम की कुछ बुनियादी ख़ामियों पर भी सवाल उठाती है।

दूसरी तरह फिल्म समाज में फैले जातिवाद की कुंठा को भी बारिकी से दिखाती है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे राजनीति में दलित समुदाय के लोगों का प्रयोग किया जाता है। धार्मिक और सियासी लोगों के लिए दलित वर्ग के क्या मायने हैं, इस पर सीरियस मेन रोशनी डालती है।

सुधीर मिश्रा एक प्रतिष्ठित सियासी खानदान से आते हैं। पिता उनके अध्यापक रहे हैं और वह इस बात को खूब बताते भी हैं कि वह एक मास्टर के बेटे हैं। लेकिन, मास्टर का ये बेटा अपनी उम्र के चौथेपन में अपनी धार खो रहा है। अपने सिनेमा को पहले जैसा पैना बनाए रखने के लिए सुधीर को कुछ तो क्रांतिकारी करना ही होगा। नहीं तो ‘दास देव’ और ‘इनकार’   जैसी फिल्मों को कौन याद रखने वाला है?




कहाँ रह गयी कमी 


सीरियस मेन के साथ जो एक दिक्कत नज़र आती है, वो यह है कि इसमें एक साथ बहुत कुछ कहने की कोशिश की गयी है और वजह से फ़िल्म कहीं-कहीं थोड़ी उलझी हुई भी लगती है। इस मोर्चे पर फ़िल्म थोड़ा कमज़ोर महसूस होती है, फिल्म का अंडर करंट ढीला है। तकनीकी रूप से भी फिल्म सहज नहीं है। बहुत जोर देकर पर्दे पर ध्यान टिकाए रखना होता है, इस फिल्म को पूरा देखने के लिए। पटकथा का बहाव बेहतर होता और इसका बैकग्राउंड म्यूजिक भी थोड़ा ठीक होता तो फिल्म मनोरंजन के पैमाने पर पास हो सकती थी।




देखे या नही


सुधीर मिश्रा के सिनेमा को एक फिल्म डॉक्टर की जरूरत अब महसूस होने लगी है, जो बिना उनकी फिल्मोग्राफी से प्रभावित हुए उनकी फिल्मों की चीरफाड़ रिलीज होने से पहले कर सके। फिल्म कुछ बहुत विशिष्ट नहीं बन सकी है, नहीं देखेंगे तो कोई खास फर्क पड़ने वाला नहीं है।

 

और अंत में रेटिंग




 

कलाकार- नवाज़उद्दीन सिद्दीक़ी, इंदिरा तिवारी, अक्षत दास, नासर, संजय नर्वेकर, श्वेता बसु प्रसाद आदि।

निर्देशक- सुधीर मिश्रा

प्लेटफॉर्म- नेटफ्लिक्स

स्टार- 3/5 

अवधि- दो घंटा





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