Saina Film Review || साइना फिल्म समीक्षा
निर्देशक
अमोल गुप्ते की यह स्पोर्ट्स ड्रामा फ़िल्म भारतीय खेल लीजेंड साइना नेहवाल की
ज़िंदगी की कहानी है. जिसने विश्वभर में भारतीय बैडमिंटन का परचम लहराया है. यह
फ़िल्म सानिया के बैडमिंटन में मिली अविश्वसनीय जीत की कहानी भर नहीं है. यह एक माँ
के विश्वास की कहानी है.जिसने अपनी बेटी की परवरिश कुछ इस कदर की है कि जीत से कम
में कभी उसे सुकून ना मिले. यह जीत की लगन की कहानी है. मां के सपनों को पूरा करने
की कहानी है. चैंपियन कोई होता नहीं है खुद को बनाना पड़ता है.एक चैंपियन को बनाने
में कितने लोगों का श्रेय होता है। यह फ़िल्म उस बात को भी पुख्ता तौर पर
दर्शाती है.
कहानी
फिल्म
में मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली साइना (परिणीति चोपड़ा) के सफर की
शुरुआत नंबर वन बनने से आरंभ होती है। प्रेस कांफ्रेंस में सवाल-जवाब के क्रम में
कहानी फ्लैशबैक में जाती है। हैदराबाद ट्रांसफर होकर आए साइना के पिता
(शुभ्रज्योति बारत) और मां ऊषा (मेघना मलिक) जिला स्तर के बैडमिंटन खिलाड़ी रह
चुके हैं। मां का सपना बेटी को देश के लिए खेलते हुए देखने का है। यही वजह है कि
अंडर 12 में जब साइना नेशनल रैकिंग में दूसरे नंबर पर आती है तो मां उसे करारा
थप्पड़ मारती है। इस थप्पड़ से आहत साइना को पिता सांत्वना देते हुए बताते हैं कि
उनकी मां के लिए जीत क्यों जरुरी है। वह जीजान से खेलती है। उसकी प्रतिभा को
निखारने में उसके कोच का भी योगदान रहता है। उसकी सफलता-विफलता में मां चट्टान की
तरह खड़ी रहती है। एक दौर ऐसा आता है जब चोटिल साइना को महीनों बैडमिंटन कोर्ट से
दूर रहना पड़ता है और कोच साथ मतभेद होने पर हताशा होती है। खेल में उसके
सूर्यास्त की खबरें आ रही होती हैं तो मां कहती है शक को अपने मन में घर मत बनाने
दे। शेरनी है तू। साइना नेहवाल है तेरा नाम। अमितोष नागपाल द्वारा लिखे ऐसे कई
संवाद प्रभावी हैं।
अमूमन
खिलाड़ियों की जिंदगानी पर बनने वाली फिल्मों में उनके संघर्षों और उसके बाद मिली
सफलता को दर्शाया जाता है। यहां पर भी साइना की जिंदगी के उतार-चढा़व, कोच के साथ हुए मतभेद और उनकी प्रेम
कहानी को सधे रुप से दशार्या गया है। निर्देशक अमोल गुप्ते ने विवादों से दूरी
बनाई है। उन्होंने पीवी संधू के साथ उनकी प्रतिद्वंद्वता का जिक्र नहीं किया है।
वह पी. कश्यप साथ साइना की प्रेम कहानी के साथ बैडमिंटन कोर्ट पर जीत के लिए दो
खिलाड़ियों के बीच प्रतिद्वंद्वता को लेकर कौतूहल और रोमांच बनाए रखने में कामयाब
रहे हैं। इसमें संगीतकार अमाल मलिक के संगीत का उन्हें पूरा सहयोग मिलता है। गाना
मैं परिंदा क्यों बनूं... जोश जगाता है। खिलाड़ी बनने के लिए माता पिता द्वारा किए
जाने वाले त्याग और परेशानियों को भी अमोल बढ़ा-चढ़ा कर पेश नहीं करते, लेकिन वह दिल को छू जाते हैं। खेल पर
फोकस करने के लिए अपने ब्वॉयफ्रेंड से दूरी बनाने की नसीहत पर बिफरी साइना कहती है
कि सचिन से कोई नहीं पूछता कि उसने 22 साल की उम्र में शादी क्यों की क्योंकि वह
मेल प्लेयर है। महिला खिलाड़ी के शादी करने को लेकर उठाए जाने वाले यह सवाल
झकझोरते हैं। इस पर विचार करने की जरुरत हैं।यह फ़िल्म आठ साल की साइना से उसके
वर्ल्ड चैंपियन बनने को पर्दे पर लेकर आता है. साइना जब फिनिश्ड ऑफ करार दी गयी थी
फिर उसने कैसे सभी आलोचनाओं पर पूर्ण विराम लगा खुद को साबित किया. ये पहलू भी
फ़िल्म में है. अच्छी बात है कि फ़िल्म में महिमामंडन या अति नाटकीय कुछ भी नहीं है.
साइना के संघर्ष को बढ़ा चढ़ाकर नहीं दिखाया गया है.
फ़िल्म
की कहानी को सिंपल लेकिन प्रभावी तरीके से कहा गया है.इमोशन भी है लेकिन उतना जो
कहानी निखारे उसे बोझिल ना बनाए. ऐसा ही दृश्य फ़िल्म में उस वक़्त है जब सानिया एक
इंटरनेशनल चैंपियनशिप में भाग लेने जाती है औऱ उसकी माँ उस वक़्त ज़िन्दगी और मौत से
जूझ रही होती है.
स्टार की
परफॉरमेंस
कलाकारों
की बात करें तो परिणीति चोपड़ा ने साइना
की ऊर्जा, जोश, उमंग और जिजीविषा को बखूबी आत्मसात
किया है। उन्होंने साइना बनने के लिए जीतोड़ मेहनत की है। वह पर्दे पर साफ झलकती
है।
उनके
बचपन का रोल निभाने वाली मुंबई की दस साल की नायशा कौर भटोए असल में बैडमिंटन
खिलाड़ी हैं। देश में सिंगल में उनकी तीसरी रैंकिंग हैं। उनका खेल और अभिनय
स्क्रीन पर देखकर आप दंग रह जाते हैं। उनकी सर्विस, उनका साइड लाइन के बीच में बिजली सा इधर से उधर चमकना, नेट के पास से शटल को पकड़ना और दूसरी
तरफ से बनी वॉली पर स्मैश मारना, उनका
हर स्टांस सांसें रोक देने वाला है। लगता ही नहीं कि आप फिल्म देख रहे हैं।
बायोपिक असल में यही होती है। मन करता है कि बस साइना बड़ी न हो और बड़ी भी हो तो
बस ऐसे ही खेलते हुए बड़ी हो जाए।
इसी
तरह साइना की प्रेमी की भूमिका निभाने वाले ईशान नकवी भी पूर्व इंटरनेशनल बैडमिंटन
खिलाड़ी हैं। उन्होंने ही परिणीति को बैडमिंटन का प्रशिक्षण दिया है। उन्हें
महाराष्ट्र के सर्वोच्च खेल सम्मान शिव छत्रपति अवार्ड से नवाजा जा चुका हैं।
मां
की भूमिका निभाने वाली मेघना मलिक का काम उल्लेखनीय है। साइना को आगे बढ़ाने की
ललक और उसकी जीत की खुशी को उन्होंने बेहतरीन तरीके से व्यक्त किया है।
कोच
की भूमिका में नरम-गरम दिखे मानव कौल भी प्रभावित करते हैं। विवादों से दूर रही
साइना की जिंदगी पारदर्शी रही है। उनका यह सफर प्रेरित करता है।
डायरेक्शन
फिल्म ‘साइना’ अमोल ने दर्शकों की पसंद के हिसाब से ही बनानी शुरू की थी। किसी खिलाडी की बायोपिक बनाना आसान नहीं होता। पहले तो ये कि हर अभिनेता खिलाड़ी भी रहा हो जरूरी नहीं होता और दूसरे ये भी कि हर खिलाड़ी के जीवन में इतनी नाटकीयता हो ही, ये भी जरूरी नहीं है।
फिल्म ‘साइना’ में अमोल गुप्ते के सामने चुनौतियां
ढेर सारी रही हैं। सिर्फ इतनी ही नहीं कि फिल्म अटक अटक कर बनने में बरसों लग गए
बल्कि उन्होंने खेल ऐसा चुना है जिसे खेलने वाले गली मोहल्ले में तो बहुत हैं
लेकिन अभिनय करने वाले इसे बहुत कम खेलते हैं। लेकिन, अमोल कमाल के निर्देशक हैं। तकनीशियन
भी बहुत ही अच्छे हैं। कैमरे के जरिए कहानी कहने में उनका जोड़ नहीं हैं। बस
उन्हें अपना खुद का तोड़ इस बात के लिए निकाल लेना चाहिए कि आखिर उनकी फिल्म में
उनकी अपनी कितनी चलनी चाहिए और कितनी दर्शकों की पसंद की।
अमोल
गुप्ते का सिनेमा एहसास का सिनेमा है। ये एहसास ऐसे हैं जो हो सकता है आपको परदे
पर दिखें ना। इन एहसासों को किरदारों की मनोदशा में देखने वाली आंखें चाहिए। नंबर
दो पर आई बिटिया को मां से मिला तिरस्कार आपको भीतर तक हिला सकता है।
फिल्म ‘साइना’ तकनीकी रूप से अधिकतर विभागों में एक उम्दा फिल्म दिखती है। अमितोष
नागपाल के संवाद बहुत पैने और धारदार हैं। एक हरियाणवी मां के इतने बेहतरीन संवाद
लिखने का उनको अच्छा फल भी मिलने वाला है। पीयूष शाह ने एक स्पोर्ट्स फिल्म के
हिसाब से कैमरे की प्लेसिंग, लाइटिंग
और मूवमेंट बहुत सटीक रखा है। उनका कैमरा फिल्म का एक अहम किरदार बनकर काम करता
दिखता है। ऐसी ही चुस्त अंगुलियां दीपा भाटिया की भी चली हैं फिल्म की वीडियो
एडीटिंग मे। साउंड डिजाइन और संगीत के मामले में फिल्म कमजोर है। अमाल मलिक फिल्म
के संगीतकार है, लेकिन फिल्म की आत्मा को दर्शक सीधा मन
से महसूस कर सकें, ऐसा कोई गाना फिल्म में बन नहीं पाया
है।
कहाँ रह
गयी कमी
साइना
एक अच्छी फिल्म है लेकिन यह और यादगार हो सकती थी. सानिया के वर्ल्ड चैंपियन बनने
पर उनके विरोधी खिलाड़ियों पर भी थोड़ा और फोकस करने की ज़रूरत थी. फ़िल्म साइना से
जुड़ी वही बातें ला पायी हैं जिनसे लगभग हर कोई परिचित है.पी वी सिंधु और उनकी
प्रतिस्पर्धा का जिक्र क्यों नहीं हुआ.
फ़िल्म
की दूसरी खामियों की बात करें तो कंटिन्यूटी में थोड़ी कसर रह गयी है. परिणीति के
चेहरे का मस्सा बड़ा छोटा होता रहता है.फ़िल्म में साइना की बहन के किरदार को ज़्यादा
तवज्जो नहीं दी गयी है.मुश्किल से एक संवाद भी नहीं है। यह पहलू अखरता है.
देखे या
नहीं
अमोल
गुप्ते ने बतौर निर्देशक अपना हौसला, हिम्मत
और हुनर फिर एक बार बड़े परदे पर पेश किया है। परिणीति चोपड़ा में भले उन्हें एक
काबिल कलाकार इस रोल लायक न मिला हो लेकिन फिल्म ये जरूर देखी जानी चाहिए।
और अंत
में रेटिंग
फ़िल्म
- साइना
निर्माता
- टी सीरीज
निर्देशक-
अमोल गुप्ते
कलाकार-
परिणीति चोपड़ा,मेघना मलिक,मानव कौल, एहसान नकवी, शुभरज्योति,नायशा कौर भटोये और अन्य
रेटिंग-
तीन










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