"लूडो" फिल्म समीक्षा || "Ludo" Film Review
'लूडो' के कहानी में एक साथ कई कहानियां हैं। कई कैरेक्टर्स हैं। सभी की जिंदगी अपनी-अपनी रफ्तार से अपनी-अपनी दिशा में बढ़ रही है। लेकिन कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, सभी कैरेक्टर्स और उनकी जिंदगी एक-दूसरे से टकराती है। सभी कहानियों का एक केंद्र हैं सत्तु भैया, जो गैंगस्टर हैं। सबकुछ ठीक वैसे ही है, जैसे लूडो के खेल में होता है। फिल्म में आगे बढ़ते हैं तो क्लालइमेक्स दिल खुश करता है। हर कहानी की डोर को बड़ी सफाई से अंत में बांधा गया है। कुछ सरप्राइज भी हैं और कुछ संदेश भी। यह 'लूडो' अंत में यही कहता है कि कभी किसी को इस बात पर नहीं आंकना चाहिए कि उसने क्यों चुना है या क्या निर्णय किया है।
कहानी
लूडो
की शुरुआत डॉन सत्तू भैया यानी राहुल सत्येंद्र त्रिपाठी (पंकज त्रिपाठी) से होती है, जो बिल्डर भिंडर का क़त्ल कर देता है। क़त्ल करके लौटते समय इस मर्डर के गवाह राहुल अवस्थी (रोहित सर्राफ) को अपनी वैन में साथ ले जाता है। राहुल एक मॉल में कर्मचारी है और अपने बॉस के आतंक का मारा है। हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि वो अनजाने में भिंडर के खून का गवाह बन जाता है।
सत्तू
की वैन आगे बढ़ती है और रास्ते में आशा (आशा नेगी) के पति भानु (भानु उदय गोस्वामी) को उठा लिया जाता है, जिस पर सत्तू का 90 लाख रुपया बकाया है। आशा, बिट्टू (अभिषेक बच्चन) की पूर्व पत्नी है। बिट्टू की आपराधिक पृष्ठभूमि रही है और छह साल की जेल काटकर अभी-अभी लौटा है। दोनों की एक बेटी (रूही) भी है। उसके जेल जाने के बाद आशा भानु से दूसरी शादी कर लेती है।
आशा,
रूही को पढ़ने के लिए हॉस्टल भेज देती है। उसी के लिए आशा के पति ने सत्तू से पैसा उधार लिया था। आशा, पति को सत्तू से छुड़ाने के लिए बिट्टू की मिन्नतें करती है। आख़िरकार बिट्टू मान जाता है और सत्तू से बात करने उसके अड्डे पर जाता है। बिट्टू और सत्तू की भी एक कहानी है।
आलोक
कुमार गुप्ता यानी आलू (राजकुमार राव) छोटे-मोटे अपराधों में लिप्त रहता है, लेकिन विकट आशिक़ है। हरफनमौला किस्म का आलू मिथुन दा की तरह लंबे बाल रखता है, उन्हीं के डांस स्टेप्स को फॉलो करता है और ज़रूरत पड़ने पर वैसे ही बात भी करता है, क्योंकि पिंकी (फातिमा सना शेख़) के फेवरिट एक्टर मिथुन चक्रवर्ती हैं। आलू बचपन से ही पिंकी को प्यार करता है और उसके लिए किसी भी हद तक जा सकता है। मगर, पिंकी की शादी मनोहर जैन (पारितोष त्रिपाठी) से हो जाती है।
मनोहर
का अफेयर किसी दूसरी औरत से चल रहा है। कुछ ऐसा घटनाक्रम होता है कि मनोहर, भिंडर के क़त्ल के आरोप में पकड़ा जाता है। पति को बचाने के लिए पिंकी आलू से मदद मांगती है, जो पिंकी को किसी भी सूरत में ना नहीं बोल सकता।
श्रुति
चोक्सी (सान्या मल्होत्रा) का सपना एक अमीर आदमी से शादी करके घर बसाने का है, जिससे लाइफ़ तनावमुक्त हो जाए। वेडिंग ऐप के ज़रिए लड़का खोजने के दौरान उसकी मुलाक़ात डॉ. आकाश चौहान (आदित्य रॉय कपूर) से होती है। कुछ मुलाकातों के बाद दोनों में शारीरिक संबंध बन जाते हैं, जिसका वीडियो इंटरनेट पर अपलोड हो गया है। कैसे? ये राज़ आगे जाकर खुलता है।
वीडियो
में सिर्फ श्रुति का चेहरा साफ दिख रहा है, इसलिए आकाश पुलिस में शिकायत दर्ज़ करवाने के लिए उसे राज़ी करने की कोशिश करता है, मगर पांच दिन बाद श्रुति की शादी है। वो तैयार नहीं होती। आख़िर, आकाश अपने बड़े भाई, जो वकील हैं, के साथ सत्तू की मदद लेने उसके अड्डे पर जाता है, ताकि कानून के दायरे से बाहर रहकर समस्या का समाधान किया जा सके।
स्टार की परफॉरमेंस
फिल्म
में लंबी चौड़ी स्टारकास्ट है। एक पर एक मंझे हुए ऐक्टर हैं और वो निराश भी नहीं करते। पंकज त्रिपाठी ने एक बार फिर दिल लूट लिया है। एक गैंगस्टर के रोल में वह अपनी छाप छोड़ते हैं। सत्तू भैया के किरदार को पंकज त्रिपाठी ने बड़ी सहजता के साथ निभाया है। यह डॉन ग़ज़ब का सेंस ऑफ़ ह्यूमर भी रखता है। उनके हिस्से कुछ बेहतरीन लाइंस भी आयी हैं।
राजकुमार राव
फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती के फैन बने हैं और वह इसे एंजॉय करते हैं। राजकुमार राव ने आलू के किरदार में अपने अलग ही रंग दिखाये हैं।
अभिषेक बच्चन ने भी बिट्टू के रूप में पर्दे पर अपनी पकड़ मजबूत की है। ,
अभिषेक बच्चन के साथ बाल कलाकार इनायत वर्मा ने बेहतरीन जुगलबंदी की है। हालांकि, बिट्टू लल्लन से कम गुस्सैल है और बड़े दिलवाला है।
जबकि
फातिमा सना शेख का किरदार भी नजरें खींचता है।
सान्या् मल्होत्रा और
आदित्य रॉय कपूर में अपने-अपने हिस्से को पूरी ईमानदारी से निभाया है।
रोहित
सर्राफ के पास डायलॉग्स कम हैं, लेकिन वह पर्ली माने के साथ अलग की रंग में दिखते हैं।
डायरेक्शन
अनुराग
बसु की फिल्मर है, इसलिए उनकी छाप हर जगह दिखती है। फिल्मम में डार्क कॉमेडी भी है और प्याीरा रोमांस भी। प्रीतम का म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोएर भी फिल्मख के माकूल है और माहौल बनाने में कसर नहीं छोड़ता। नीले और लाल रंगों से अनुराग बसु का प्रेम इस फिल्म में दकमता है।
एक
कैरेक्टर
की कहानी शुरू होती है, उसका अगला-पिछला बताया जाता है और फिर दूसरे की कहानी शुरू होती है। लेकिन धीरे-धीरे यह किसी पहेली जैसी उलझ जाती है। कई सारे कैरेक्टपर और कई सारी कहानियों को बांधने की कोशिश में अनुराग बसु डोर की कुछ सिराओं पर कमजोर पकड़ के कारण यहां थोड़ा चूकते हैं। हालांकि, उन्होंने सभी सिराओं को जोड़कर रखने की पूरी कोशिश की है।
कहा रह गयी कमी
कई
ऐसे मौके हैं, आपको यह बोझिल लगने लगता है।
देखे या नहीं
लूडो
एक मनोरंजक फ़िल्म है। बस देखते समय ध्यान रखिए कि ध्यान ना भटके, क्योंकि ध्यान हटते ही आप लूडो की कोई चाल मिस कर जाएंगे और बाज़ी हाथ से निकल जाएगी। वक्त निकाल कर आप भी इस फिल्म को देख डालिए।
और अंत में रेटिंग
ऐक्टर: अभिषेक बच्चन, राजकुमार राव, आदित्य रॉय कपूर, पंकज त्रिपाठी, सान्या मल्होत्रा, फातिमा सना शेख
डायरेक्टर: अनुराग बासु
श्रेणी: हिंदी, ऐक्शन, ड्रामा
अवधि: 2 Hrs 10 Min
रेटिंग: 3/5












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