'काली खुही' फिल्म समीक्षा || 'Kaali Khuhi' Film Review
नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई 'काली खुही' (खुही का मतलब कुआं होता है) सोच के उसी काले अंधेरे तक लेकर जाती है, जहां परम्परा और रीति-रिवाज़ के नाम पर स्त्रियों के दमन, शोषण और अत्याचार का सिलसिला सदियों से चला आ रहा
है।
हालांकि,
समय के साथ शिक्षा और ऐसे मुद्दों के लिए सामाजिक जागरूकता ने हालात काफ़ी सुधारे हैं, मगर दकियानूसी सोच की काली खुही इतनी जल्दी कहां पाटी जा सकती है और जब तक यह 'खुही' पूरी तरह पट नहीं जाती, तब तक ऐसी कहानियां बनती और सुनाई जाती रहेंगी।
वैचारिक रूप से झिंझोड़ने वाली फ़िल्म है 'काली खुही' , जिसे देखते हुए कई बार विरक्ति का भाव भी आता है कि आख़िर एक स्त्री दूसरी स्त्री या नन्ही-सी जान के लिए इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती है? कैसे कोई इतना क्रूर हो सकता है कि ठीक से आंखें खोलने से पहले ही मासूम उम्मीदों को काली खुही में फेंक दे, वो भी एक प्रथा के नाम पर और पूरा गाँव उस प्रथा आंख मूंदकर पालन करे। उसके ख़िलाफ़ एक आवाज़ भी ना करे।
आख़िर किसी पुरुष का ख़ून क्यों नहीं खौलता इस इंसानियत के नाम पर कालिख बनी परम्परा के ख़िलाफ़ ? बचपन में विरोध करने की हिम्मत नहीं थी, क्योंकि बातें समझ में नहीं आतीं, मगर बड़ा होने पर तो इसका विरोध किया जा सकता है। पुरुष की इस बेबसी पर चिढ़ भी होती है। हालांकि, 'काली खुही' में एक ही प्रमुख पुरुष किरदार दर्शन है, जिसे सत्यदीप मिश्रा ने निभाया है। दर्शन के परिवार के ज़रिए ही 'काली खुही' की काली करतूतें दिखायी गयी हैं।
कहानी
इस की कहानी पंजाब के एक काल्पनिक गांव में सेट की गयी है, जहां दर्शन की मां (लीला सैमसन) रहती है। मां के बीमार होने की ख़बर पाकर दूसरे कस्बे में रह रहा दर्शन अपनी पत्नी प्रिया (संजीदा शेख़) और 10 साल की बेटी शिवांगी (रीवा अरोड़ा) के साथ गांव आता है। प्रिया को अपनी सास की कड़वी बातें अच्छी नहीं लगतीं। वो पढ़ी-लिखी नौकरी करने वाली औरत है। प्रिया गांव नहीं जाना चाहती, पर पति की ज़िद करने पर चली जाती है।
दर्शन
की मां की बीमारी की वजह एक रूह है, जो उसके घर में ही है। फ़िल्म के आरम्भिक दृश्य में इस रूह के कुएं से आज़ाद होकर घर तक पहुंचने की कहानी दिखाई जा चुकी है। दर्शन की मां अचानक एक दिन ठीक हो जाती है और वो प्रिया को बेटा ना होने के लिए कोसती है। तब कारण समझ में आता है कि प्रिया गांव क्यों नहीं आना चाहती।
इस
बीच शिवांगी को घर में रूह दिखने लगती है, जो उसी की उम्र की एक बच्ची (हेतवी भानुशाली) है। शबाना आज़मी, दर्शन की पड़ोसी हैं। सब उन्हें मासी कहते हैं। शबाना का किरदार गांव के उस काले रहस्य की किताब का सबसे अहम पन्ना है, जिसे शिवांगी पढ़ना चाहती है और इसकी तह तक जाना चाहती है, क्योंकि इसी रहस्य में उस रूह का राज़ भी छिपा है, जो उसे दिखाई देती है।
धीरे-धीरे रूह का असली चेहरा सामने आता है। रूह दादी को मार देती। दर्शन पर भी हमला करती है, मगर वो बच जाता है। फिर प्रिया की बारी आती है। वो गंभीर रूप से बीमार पड़ जाती है। आख़िर, रूह उसी कुएं के पास दर्शन को भी मार देती है। मारने से पहले सवाल पूछती है कि उसने उसे (रूह) को क्यों छोड़ दिया था? दर्शन का रूह से यह सवाल पूछना काली खुह की कहानी का अहम पड़ाव है।
रूह,
मासी के साथ रह रही बेबी यानी चांदनी (रोज़ राठौड़) को अपने क़ब्ज़े में लेती है। मासी तय करती है कि गांव छोड़कर चला जाना चाहिए। मगर, रूह जाने नहीं देती। तब मासी शिवांगी को कहती है कि वो नई पीढ़ी है। वो ही रोक सकती है। क्या शिवांगी रूह को रोक पायी? रूह दर्शन के परिवार के पीछे ही क्यों पड़ी है? ऐसे ही *सवालों के जवाब काली खुही की कहानी को आगे बढ़ाते हैं और इन्हीं में फ़िल्म की मैसेज छिपा है।
पूरे
गांव को धुंध और मनहूस-से सन्नाटे में लिपटा दिखाया गया है। बस एक डिस्पेंसरी के सामने ज़रूर भीड़ दिखायी गयी, जहां लोग गांव में महामारी होने की चर्चा कर रहे हैं। इस महामारी को श्राप भी कह रहे हैं, जो काली खुही में दफ़्न सैकड़ों मासूमों की रूहों की वजह से है। लोग चर्चा कर रहे हैं कि खेत में 11 लाशें मिली हैं, मगर फिर भी कहीं कोई सरकारी तंत्र ख़बर लेने वाला नहीं।
स्टार
का परफॉरमेंस
अदाकारी के हिसाब से देखें तो काली खुही की असली 'रूह' शबाना आज़मी ही हैं। दाद उनकी इसलिए भी देनी बनती है कि परदे पर जो रूप उन्होंने बिना प्रोस्थेटिक के धरा, वह फिल्म में भयानक और वीभत्स दोनों रस के बीज बोता है। रिश्ते निभाते समय वह करुणा भी ले आतीं हैं। कुछ दृश्यों में वीर व रौद्र रस भी झलकते हैं और अद्भुत व शांत तो वह है हीं। बीते महीने ही 70 साल की हुईं शबाना की परदे पर ये सक्रियता ही फिल्म ‘काली खुही’ की असली अंतर्धारा है।
सत्यदेव मिश्र ने भी फिल्म में हॉरर के लिए जरूरी हड़बड़ाहट वाला हिस्सा बखूबी संभाला है। लेकिन, फिल्म में नोटिस करने लायक काम है रीवा और संजीदा शेख का।बाकी कलाकारों ने उनका अच्छा साथ दिया है, जिससे डेढ़ घंटा बिताना मुश्किल नहीं लगता।
फिल्म में विशिष्ट उल्लेख करने लायक दो बातें हैं. एक तो सिनेमैटोग्राफर सेजल शाह की बेहतरीन लाइटिंग और कैमरा मूवमेंट और दूसरी संयुक्ता कजा की वीडियो एडीटिंग. दोनों ने मिलकर टेरी समुंद्रा की फिल्म ‘काली खुही’ को बहुत मजबूत बनाया है. सेजल शाह की सिनेमैटोग्राफी ने गांव के वीराने को सही से क़ैद किया है. हालांकि लोकेशंस के नाम पर दर्शन का घर और ऊपर बना वो कमरा, जिसमें रूह रहती है, मासी का घर और काली खुही ही है सीमित लोकेशंस में दृश्यों को बदल बदलकर दिखाना सिनेमैटोग्राफर के लिए चुनौती होती है।
फिल्म
की कमजोर कड़ी हैं इसका बैकग्राउंड म्यूजिक जिसे थोड़ा देसी होना चाहिए था और इसकी पटकथा जिसे रचने में इसकी टीम गड़बड़ा गई है।
डायरेक्शन
'काली खुही' का निर्देशन टेरी समुंद्रा ने किया है। अमेरिका में बसी टेरी इससे पहले आइसक्रीम, वल्लाह, कुंजो जैसी शॉर्ट फ़िल्में बनाती रही हैं। फ़िल्म के संवाद रूपिंदर इंदरजीत ने लिखे हैं। स्टोरी-स्क्रीनप्ले टेरी और डेविड वॉल्टर लेच का है। स्क्रीनप्ले से यह एहसास होते देर नहीं लगती कि भारत और यहां के गांव को विदेशी नज़र से देखा गया है। टेरी के निर्देशन में देसीपन की कमी खलती है।
कहाँ रह गयी कमी
'काली खुही' का मैसेज जितना स्ट्रॉन्ग है, उसे दिखाने का तरीक़ा उतना ही लचर है। कहानी में कई ऐसे झोल हैं, जो कमज़ोर कर देते हैं। मसलन, फ़िल्म में दिखाया गया है कि बच्चियों को पैदा होने के बाद कुएं में फेंक दिया जाता था, मगर रूह की उम्र 10 साल के आस-पास दिखायी गयी है। ज़ाहिर बात है कि नवजात को तो रूह नहीं बनाया जा सकता, लेकिन रूह की उम्र 10 साल दिखाना भी गले नहीं उतरता। दर्शन का अजीबो-ग़रीब व्यवहार समझ से परे है। उसके व्यवहार में रहस्य और उत्तेजना की एक परत रहती है, मगर क्यों? इसका कहानी में कहीं स्पष्टीकरण नहीं है।
देखे
या नही
अगर आप कैमरा
और
लाइटिंग
के
दीवाने
है
तो
फिल्म
देख
सकते
है।
बाकी
आप
देख
लो
हॉरर
के
नाम
पर
क्या-क्या
झेल
सकते
हो।
कलाकार-
शबाना आज़मी, संजीदा शेख़, सत्यदीप मिश्रा आदि।
निर्देशक- टेरी समुंद्रा
निर्माता- रैमोन चिब, अंकु पांडे आदि।
प्लेटफार्म- नेटफ्लिक्स
अवधि- 1:30 घंटा
रेटिंग- 3/5










4 टिप्पणियाँ
बहुत बढ़िया
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंgood
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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