कागज़ फिल्म समीक्षा || Kaagaz Film Review
लाल
बिहारी की कहानी पर आधारित है फिल्म कागज़. सतीश कौशिक की यह फिल्म मुख्य तौर पर लाल बिहारी मृतक नाम के एक व्यक्ति के जीवन पर आधारित है जिन्होंने 18 साल के लंबे संघर्ष के बाद खुद को जीवित साबित किया था। ऐसा भी कह सकते हैं कि यह फिल्म किसी सरकारी कागज की अहमियत बताने वाली सच्ची घटनाओं पर आधारित है। ज़ी5 पर रिलीज़ हुई सलमान ख़ान निर्मित और सतीश कौशिक निर्देशित कागज़ ऐसी ही एक अनोखी लड़ाई की कहानी है।
कहानी
यूपी
के खलीलाबाद के एक छोटे से गांव का रहने वाला भरत लाल (पंकज त्रिपाठी) एक बैंड मास्टर है जो अपनी पत्नी रुक्मणि (एम मोनल गज्जर) और बच्चों के साथ सुख से रह रहा है। भरत लाल की पत्नी रुक्मणि उससे अपना काम और बढ़ाने के लिए बैंक से लोन लेने की सलाह देती है। जब भरत लाल बैंक जाता है तो लोन के बदले उससे गिरवी रखने के लिए जमीन के कागज मांगे जाते हैं। भरत लाल अपनी जमीन के कागज लेने जाता है तो यह जानकर हैरान रह जाता है कि कागजों के मुताबिक वह मर चुका है और उसकी जमीन उसके चाचा के बेटों को बांट दी गई है। इसके बाद शुरू होता है भरत लाल का लंबा संघर्ष जिसमें वह लेखपाल से लेकर प्रधानमंत्री और कोर्ट के चक्कर काटता रहता है। भरत लाल की मदद के लिए आगे आते हैं साधुराम केवट वकील (सतीश कौशिक) जो अंत तक उनकी मदद करते हैं। भरत लाल अपने नाम के आगे मृतक लगा लेता है और उसके साथ पूरे प्रदेश के ऐसे लोग जुड़ जाते हैं जिन्हें कागजों में मृत घोषित कर दिया गया है। इस लंबे संघर्ष में भरत लाल का काम-धंधा बंद हो जाता है, परिवार साथ छोड़ देता है लेकिन भरत लाल हार नहीं मानता है।
18 साल के लंबे संघर्ष के बाद भरत लाल कैसे कागजों में खुद को जीवित करता है, इसी संघर्ष की कहानी है 'कागज'।
स्टार की परफॉरमेंस
इस समय पंकज त्रिपाठी को बॉलिवुड का नगीना कहना बिल्कुल सही रहेगा। वह हर किरदार में इतना भीतर तक उतर जाते हैं कि बिल्कुल उसी के जैसे दिखने लगते हैं। पंकज त्रिपाठी अपनी हर फिल्म से ऐक्टिंग की बुलंदियां छूते जा रहे हैं। भरत लाल के किरदार में पंकज त्रिपाठी ने इतनी अच्छी ऐक्टिंग की है कि आप उनके किरदार का दर्द समझ सकते हैं। शायद भरत लाल का किरदार उनके जैसा कुछ गिने-चुने ऐक्टर ही निभा सकते हैं। भरत के किरदार की सहजता, सरलता और चालाकी को पंकज ने बेहद बारीकी से अपनाया है। यह उनकी अदाकारी का ही कमाल है कि इस किरदार की बेबसी पर आपको तरस के साथ हंसी भी आती है। पंकज त्रिपाठी अपने किरदार में इतना घुस गए हैं कि आप कुछ भूल जाते हैं कि यह कोई फिल्म चल रही है और कोई अभिनेता एक्टिंग कर रहा है।
साधुराम केवट एडवोकेट के रोल में सतीश कौशिक हों या भरत की पत्नी रुक्मिणी के रोल में मोनल गज्जर या फिर विधायक अशर्फ़ी देवी के किरदार में मीता वशिष्ठ, सभी ने भरत लाल के किरदार को मजबूत किया है। अमर उपाध्याय,
दबंग विधायक के किरदार में हैं। हालांकि, उनके हिस्से में ज़्यादा
कुछ आया नहीं। तारीफ़ उन स्थानीय कलाकारों की भी करनी होगी, जिन्होंने फ़िल्म में छोटे-छोटे किरदार निभाये हैं। इन कलाकारों
की वजह से दृश्यों के प्रभावी संयोजन में मदद मिली है।
डायरेक्शन
डायरेक्टर सतीश कौशिक फिल्म को बिल्कुल हल्के-फुल्के अंदाज में शुरू करते हैं लेकिन वक्त के साथ यह फिल्म बेहद सीरियस होती जाती है। जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती जाती है तो आप भरत लाल की पीड़ा और जिद को गहराई से समझने लगते हैं। फिल्म संघर्ष के जज्बे का पॉजिटिव संदेश भी देती है। हालांकि फिल्म कभी-कभी बहुत धीमी लगने लगती है लेकिन भरत लाल के नए-नए हथकंडे एक बार फिर कहानी में आपका इंट्रेस्ट जगा देते हैं। सतीश कौशिक का निर्देशन संतुलित है। साथ में पंकज त्रिपाठी जैसा एनएसडी का जूनियर हो तो कोई भी क़िला फतेह करना मुश्किल नहीं होता। फ़िल्म में वास्तविक लोकेशंस का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है, जो फ़िल्म की विश्वसनीयता
बढ़ाता है। क्रेडिट रोल से पहले सलमान ख़ान की आवाज़ में कागज़ पर कही गयी कविता धारदार और विचारोत्तेजक है। कागज़ की लड़ाई देश में आज भी जारी है। ऐसे में कहानी दशकों पुरानी होते हुए भी सामयिक है।
कहाँ रह गयी
कमी
फिल्म को शायद थोड़ा छोटा किया जा सकता था।
देखे या नहीं
पंकज त्रिपाठी के फैन हों और बिल्कुल नए और अलग मुद्दे पर फिल्म देखना चाहते हों तो मिस न करें।
और अंत में
रेटिंग
ऐक्टर: पंकज त्रिपाठी,सतीश कौशिक,एम मोनल गज्जर,मीता वशिष्ठ,अमर उपाध्याय,नेहा चौहान,संदीपा धर,ब्रिजेंद्र
काला
डायरेक्टर : सतीश कौशिक
श्रेणी: Hindi,
Biography, Drama
अवधि: 1
Hrs 56 Min
रेटिंग: 3.5/5








4 टिप्पणियाँ
बहुत बढ़िया
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंbahut achcha
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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