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Suraj Pe Mangal Bhari Film Review || सूरज पे मंगल भारी फिल्म समीक्षा

 

सूरज पे मंगल भारी फिल्म समीक्षा || Suraj Pe Mangal Bhari Film Review




वाकई निर्देशक की तारीफ करनी होगी कि कोरोना काल में जब जाने-माने फिल्मकारों ने अपनी बड़ी फिल्मों को ओटीटी पर रिलीज करने का आसान रास्ता चुना, तो अभिषेक ने फिल्म को थिएटर में लाने का साहस किया। सभी जानते हैं कोविड 19 के चलते कई बड़ी फिल्मों को तीसरे पर्दे का दामन पकड़ना पड़ा, मगर सूरज पे मंगल भारी को दर्शक सिनेमाघरों में जाकर देख सकते हैं।



कहानी


कहानी शुरू होती है 90 के दशक से, जहां मंगल राणे (मनोज बाजपेयी) एक मैरिज डिटेक्टिव है। उसे रास नहीं आता कि लड़कों का घर बसे, इसलिए वह अपने तौर पर जासूसी करके शादी करने के इच्छुक लड़कों के नुक्स निकालता है और उनकी शादियां तुड़वा देता है। असल में उसकी अपनी प्रेमिका (नेहा पेंडसे) की शादी उसके बजाय किसी और से हो गई थी और वह अपनी शादी से खुश नहीं थी। यही वजह है कि मंगल राणे ने सारी शहर की लड़कियों को गलत लड़कों से बचाने का जिम्मा ले लिया है। 




मगर कहानी में ट्विस्ट तब आता है, जब वह सूरज (दिलजीत दोसांज) की शादी तुड़वा देता है। उधर बदला लेने पर उतारू सूरज को मंगल की बहन तुलसी (फातिमा सना शेख) से ही प्यार हो जाता है। अब मंगल अपनी बहन तुलसी और सूरज को दूर करने के लिए कैसे प्रपंच रचता है, यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।




स्टार की परफॉरमेंस


कलाकारों का अभिनय फिल्म का सशक्त पहलू है। मनोज बाजपेयी जैसे समर्थ अभिनेता ने अपने अभिनय की विशिष्ट शैली से मंगल के किरदार को भारी रखा है, तो दिलजीत दोसांझ भी सूरज के चरित्र में खासे चमके हैं। फातिमा सना शेख ने खूबसूरत लगी हैं और वे अपनी भूमिका को निभा ले गईं हैं। मराठी माणूस की भूमिका में अन्नू कपूर ने खूब रंग जमाया है। सुप्रिया पिलगांवकर, मनोज पाहवा, सीमा पाहवा, विजय राज और नेहा पेंडसे जैसी सहयोगी कास्ट ने खूब साथ दिया है।




डायरेक्शन


निर्देशक अभिषेक शर्मा की इस फिल्म का फर्स्ट हाफ सुस्त है और इसका कारण है फिल्म के नब्बे के दशक का बैकड्रॉप। कहानी में आज के दौर की तरह 'इंस्टंट' कुछ भी नहीं है। मगर सेकंड हाफ में फिल्म अपनी रफ्तार पकड़ती है और मनोरंजन के मौके भी देती है। फूहड़ता से परे साफ-सुथरी कॉमिडी फिल्म की विशेषता है, मगर विषय के अनुरूप कहानी में कॉमिडी का तड़का और जोरदार हो सकता था। डायलॉग्स में अगर और ज्यादा पंचेज होते, तो फिल्म और मजेदार बन सकती थी।




कहा रह गयी कमी


विषय के अनुरूप कहानी में कॉमिडी का तड़का और जोरदार हो सकता था। डायलॉग्स में अगर और ज्यादा पंचेज होते, तो फिल्म और मजेदार बन सकती थी।




देखे या नहीं


कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान ओटीटी पर जो दर्शक डार्क कॉन्टेंट देखकर थक गए हों, उनके लिए यह लाइट मनोरंजन साबित हो सकती है। साफ-सुथरी कॉमिडी फिल्मों के शौकीन यह फिल्म देख सकते हैं। सिनेमाघरों में हर तरह के प्रीकॉशंस और सोशल डिस्टेंसिंग के बीच दर्शक चाहें तो परिवार संग जाकर यह फिल्म देख सकते हैं।


और अंत में रेटिंग




ऐक्टर: मनोज बाजपेयी, दिलजीत दोसांझ, फातिमा सना शेख, सुप्रिया पिलगांवकर, नेहा पेंडसे

डायरेक्टर : अभिषेक शर्मा

श्रेणी: फैमिली कॉमिडी

अवधि: 2 Hrs 20 Min

रेटिंग: 2/5

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